पीपल पेड़ों का बजूद मिटने की कगार पर

हिन्दू धर्म में पीपल के पेड़ की आध्यात्मिक मान्यता तो है,साथ ही साथ इस पेड़ में पर्यावर्णिक बिशेषयता भी है। भगबान राम चन्द्र की अनुपस्थिति में माता सीता ने इसी पेड़ को साक्षी मानकर अपने सबर्गीय ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया था। वेदों,शास्त्रों में पीपल के पेड़ को बृक्षों का पितामह बताया गया है। आज हालात ऐसे बन चुके की इस पेड़ का अस्तित्व भी मिटने की कगार पर पहुंच चुका है। पीपल पेड़ की खासियत यह कि हमें आक्सीजन ही छोड़ता है। वायु शुद्ध होने के कारण प्राचीन काल में इस पेड़ की छाव में शिक्षादान दिया जाता था। ना जाने पुराने समय में कितनी ही पंचायतें हुई होंगी पीपल के नीचे,लेकिन अब न तो पंचायतें हो रही हैं और न ही पीपल के पेड़। हिन्दू मान्यता के अनुसार पीपल पेड़ को लगाना शुभ माना जाता है। यही कारण है कि जो पेड़ खुद ब खुद उग जाते हैं बही अस्तित्ब में हैं,जबकि नए पेड़ नहीं लगाए जाते और ये पेड़ अब लुप्त होते जा रहे हैं। किसी जमाने में पीपल पेड़ के नीचे चौपाल लगता था। यह एक ऐसा विश्रामस्थल हुआ करता था,जहां गांब के बच्चों से लेकर बूढ़े तक एक साथ बैठते थे,तथा सभी तरह के चर्चे हुआ करते थे। गांव की समस्या का निपटारा,सारे मामलों को रफा दफा जिस पेड़ के नीचे हुआ करता था आज बही पेड़ लुप्त हो रहा है। शायद लोगों को इस पेड़ पर पक्षियों की चहचहाने की गूंज रास नहीं आ रही। स्वार्थी लोगों ने इस बहुगुणी पौधे पर भी प्रहार करना शुरू कर दिया है। फायदों से भरपूर पीपल के पेड़ को जहां सरंक्षण दिया जाना चाहिए,बहीं कुछ लोग अपने स्वार्थपूर्ति के लिए इस पर बड़ी बेदर्दी से कुल्हाड़ी चला रहे हैं। यह स्थिति है कि पीपल के पेड़ गांवों में देखने तक को नहीं मिलते हैं। कभी इस पेड़ को कच्चे धागे से बांधते हुए जल आदि चड़ाकर लोग अपनी मनोकामना पूर्ण किया करते थे।पीपल पेड़ों के अभाव कारण लोग आजकल चमड़ी रोग के साथ साथ दमा के शिकार होते जा रहे हैं। इस पेड़ की लकड़ी का हवन सामग्री में उपयोग किया जाता है। अगर समय रहते आक्सीजन मुहैया करवाने बाले इस इस पेड़ों की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं कि गई तो मानवजाति को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। हिमाचल प्रदेश की सरकारें हर साल पौधरोपण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं। मगर वावजूद इसके जंगली पहाड़ों के मिटते बजूद को कायम रखने में फिलहाल सफल नहीं हो पा रहे हैं। पौधरोपण अब सिर्फ सोशल मीडिया के लिए सेल्फी लेकर प्रकृति से प्यार जताने के साधन बनता जा रहा है। ऐसे पौधरोपण क्या सच में प्रकति की सुरक्षा कर पा रहे सभी जानते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाकर भी हम लोग इस दिशा में सफल नहीं हो पा रहे हैं।पर्यावरण प्रदूषण बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा जिसके चलते एक आम आदमी को निकटम भविष्य में सबच्छ वायु मिल पाना मुश्किल हो सकता है। हिमाचल प्रदेश पहाड़ी राज्य होने के बाबजूद भी उसके पर्यावरण में अब जमीन आसमान का अंतर आ गया लगता है।एक समय ऐसा था कि पहाड़ में चलने ठंडी हवाएं सबका मन मोह लेती थी,मग़र पिछले कुछ सालों में पर्यावरण में अचानक आए बदलाव से बेतहाशा पड़ने बाली गर्मी से लोग आहत हैं। बेमौसमी हो रही बारिशें भी इस बात का संकेत देती की पहाड़ की जल,वायु अब मौसम के विपरीत चल रही है। कहाँ गए बो दिन जब लोग घरो के आंगन में लगाए गए शहतूत पेड़ों के नीचे चारपाई पर बैठकर घण्टों आराम किया करते थे। बांस पेड़ की टहनियां अक्सर झूलती हुई बातावरण शीतल युक्त बनाती थी।बांस का पेड़ आक्सीजन देने के साथ साथ कई लोगों के घरों की रोजी रोटी का जरिया भी हुआ करती थी।लोग बांस की टोकरियाँ, पेड़ू,टोकरु,शज आदि बनाकर भी आजीविका कमाते थे।हालात आज ऐसे बन चुके की ऐसे आक्सीजन देने बाले पेड़ देखने तक को नहीं मिल रहे हैं।नतीजन ऑक्सीजन अभाव में लोग अपने घरों की चारदिवारी के अंदर बिजली से चलने बाले पंखों और एयरकंडीशनर की हवाओं में दुबके पड़े हैं। लगातार बिजली से मिलने बाली आक्सीजन का आम आदमी के शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता कोई सोचने को तैयार नहीं है।हिमाचल प्रदेश में प्रकृति ने अपना कहर भूस्खलन के नाम से बरपाना शुरू कर रखा है। आए दिन पहाड़ दरक कर मानबता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। स्कूल,कालेजों में राष्ट्रीय सेवा योजना की इकाइयां चलाई जा रही जो समाज सेवा करने में हमेशा आगे रहती आई हैं। प्रदेश सरकारों को ऐसे स्वयं सेवकों से लगातार पौधरोपण करवाकर पर्यावरण की सुरक्षा करनी चाहिए।



