कांगड़ा

पौंगबांध झील में मेहमानों की चहल पहल बड़ी

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पौंगबांध झील में मेहमान पक्षियों की आमद शुरु हो चुकी है। पर्यटक भी बोट में सवार होकर झील में उठने बाली लहरों का आनद उठा रहे हैँ। कुल मिलाकर पौंगबांध झील में पर्यटकों सहित प्रवासी पक्षियों की चहल पहल बड़ी है। पौंगबाँध झील में अतिशीघ्र बाटर स्पोर्ट्स गतिबिधियां भी शुरु होने की उम्मीद है। पक्षी अभ्यारण में आवारा पशुओं ठहराव कारण झील की सुंदरता को ग्रहण न लगे सबंधित विभाग,प्रशासनिक अधिकारियों को इस बारे अवश्य फोकस करना चाहिए। जिला कांगड़ा को पर्यटन की राजधानी बनाने को लेकर बजट का प्रावधान भी प्रदेश सरकार ने कर दिया है। पौंगबांध झील को सुरक्षा लिहाज से अत्यधिक सुरक्षित बनाने की जरूरत है। झील में आए दिन पर्यटकों की डूबने से मौत होने की सुर्खियाँ दिल को दहला देती हैँ। आज दिन तक किसी सरकार ने पौंगबांध झील का कायाकल्प किए जाने की सुध नहीं ली। सुख की सरकार द्वारा हिमाचल प्रदेश को पर्यटन दृष्टि से बिकसित बनाकर अपनी आय का प्रमुख स्त्रोत बनाने को लेकर छेड़ी मुहीम काबिलेतारीफ है। देवभूमि को पर्यटन दृष्टि से विकसित किए जाने की बातें सरकारें अक्सर करती थी,मगर आज दिन तक इसमें सफल नहीं हो पाई हैं। आज हालात इस कदर नाजुक बन चुके की सरकार के ऊपर करोड़ों रुपयों कर्ज की देनदारी है। हिमाचल प्रदेश के पास ऐसा क्या नहीं जो पर्यटकों को जहां आने के लिए मजबूर न कर सके।आज जरुरत प्रदेश में कनेक्टबीटी की समस्या का समाधान किए जाने की। रेगिस्थान में बसे देश आज व्यवसाय के लिए प्रसिद्ध माने जा चुके हैं। प्रदेश के पास अपार प्राकृतिक सौंदर्य वन संपदा होने बावजूद भी हम लोग आर्थिक रूप से संपन्न नहीं वन पाए हैं। देवताओं की भूमि में प्रत्येक जगह मंदिर हैं।ऐसेधर्म स्थलों प्रति श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है।पहाड़,झरने,नदियां,सुरंगें,पुल,मंदिर,जंगल,बांध,नेरोगेज रेलवे लाइन सहित स्वच्छ पर्यावरण भी प्रदेश की धरोहर है।मगर इसके बावजूद भी सरकारें प्रदेश को पर्यटन की दृष्टि से विकसित क्यों नहीं बना पा रही चर्चा का विषय है।सर्दियों में पौंगबांध झील में बारहेडिड गीज, नार्दन पेंटल, कामनकुट, लिटल कोमारेंट,चीफ चेफ,शेल्डन, कामन पोचार्ड, कामन टिल, लिटिल,कोमारेट, सपाटीवल, मलार्ड वर्ड, यूरेशियन टीलमूरहेन आदि प्रजातियों के पक्षी अपना डेरा जमाते हैँ। मेहमानों की सुरक्षा सीसीटीवी कैमरों सहारे किए जाने की विभाग वात करता है।साइजेरिया में बहुत अधिक ठंड पड़ती जिसके चलते ऐसे प्रवासी पक्षी हिमाचल प्रदेश के बांधों में रुकते हैं।सर्दियों में बांधों किनारे रहकर और गर्मियां आने से पहले ही चलते बनते हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों से प्रवासी पक्षियों की सुरक्षा भी अव खतरे से खाली नहीं रही है।कुछेक लोग प्रवासी पक्षियों का शिकार किया जाना भी अपना शौक वना चुके हैं।कोरोना वायरस काल के दौरान करीब पांच हजार प्रवासी पक्षियों का अचानक मरने की गुत्थी अभी तक सुलझ नहीं पाई है?।हालंकि पक्षियों की मौत का प्रमुख कारण कोरोना वायरस को ठहराया गया था।पक्षियों की मौत इसलिए भी संदेह के घेरे में आ जाती क्योंकि अन्य पक्षियों के मरने की कोई घटना उजागर नहीं हुई थी?। हिमाचल प्रदेश कांगड़ा जिले में शिवालिक पहाड़ियों में आर्दभूमि पर व्यास नदी पर बांध बनाकर एक जलाशय है।इस जलाशय को महाराणा प्रताप सागर झील के नाम से जाना जाता, जिसे 1975 में वनाया गया था। महाराना प्रताप के सम्मान में नामित यह जलाशय एक वन्यजीव अभ्यारण्य और रामसर सम्मेलन द्वारा भारत में घोषित पच्चीस अंतराष्ट्रीय आर्दभूमि साइटों में एक है।जलाशय 24,529 हेक्टेयर के एक क्षेत्र तक फैला और झीलों का भाग 15,662 हैक्टेयर है। पौंग जलाशय हिमाचल प्रदेश में हिमालय की तलहटी में सबसे महत्वपूर्ण मछली बाला जलाशय है।इस जलाशय में महासीर, राहु मछली अत्यधिक पाई जाती है। जलाशय में पकड़ी जाने बाली मछली हिमाचल प्रदेश सहित पंजाब राज्य में भी बेची जाती है।यही नहीं जलाशय में विद्यार्थियों को जल क्रीड़ाए भी सिखाई जाती हैं।देश,विदेश के पर्यटक हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों का लुत्फ उठाते हुए इस जलाशय में घूमना नहीं भूलते हैं।मछुआरे किश्तियों में सवार होकर मछली पालन करके अपने परिवारों का जीवन,यापन करते हैं।पर्यटक बोट में बैठकर इस जलाशय को घूमना बहुत पसंद करते हैं।बरसात बाद जलाशय में पानी का जल स्तर कम हो जाता और इसके आस पास की जमीन खाली हो जाती है।कुछेक प्रभावशाली लोग इस जमीन पर जबरदस्ती खेतीबाडी करने की कोशिश करते हैं। वन्य प्राणी विभाग की सख्त हिदायत बावजूद ऐसा काम वर्षों से चल रहा है। पौंग बांध किनारे खाली पड़ी जमीन पर लोग ट्रैक्टरों से जुताई करके फसलें उगाने की कोशिश करते हैं।अक्सर प्रवासी पक्षी ऐसे लोगों की उम्मीदों पर पानी फेरकर खेतों में डाल रखे बीज को खा जाते हैं। वहीं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता की जलाशय किनारों की जमीन पर खेतीबाड़ी करने वाले लोगों द्वारा प्रवासी पक्षियों को मारने के हथकंडे न अपनाएं जाते होंगे?। एक साथ हजारों प्रवासी पक्षियों का मरना भी बहुत सवाल खड़े करता है। वन्य प्राणी विभाग और लोगों में आर, पार की लड़ाई चलती रही जिसके चलते पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ता था। इस जलाशय आसपास पेड़ पौधों की दरकार है। सर्दियों के मौसम में अत्यधिक शीत लहर चलने की वजह से ऐसे प्रवासी पक्षी मरते रहे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।अक्सर जलाशय में डूबने की वजह से कई लोगों की मौत हो चुकी है। जलाशय के विचोबिच बाथु नामक लड़ी जिसे पर्यटक देखना कभी नहीं भूलते हैं। हैरानी इस बात की इस जहां पर अभी तक कोई दुकान तक नहीं खुल पाई है। वहीं पर्यटको का झील बारे कोई सही मार्गदर्शन करने वाला गाइड भी सरकार ने नियुक्त नहीं किया है।पूर्व सरकार ने एक कार्यक्रम जहां आयोजित किए जाने की योजना बनाई, मगर कोरोना वायरस चलते उसे स्थगित करना पड़ा था। प्रदेश सरकार को अपना खाली खजाना भरने के लिए अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण, सड़कों का सुधार,पठानकोट से जोगिंद्रनगर नेरोगेज रेलगाड़ियों के इंजनों में सुधार सहित पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाए जाने पर अधिक फोकस करना होगा। हिमाचल प्रदेश पर्यटन की दृष्टि से विकसित होने पर सरकारों सहित आम जनमानस को भी इसका लाभ होगा। पौंगबांध पर बना पुल रात को सुरक्षा लिहाज से बंद कर दिया जाता है। अगर साथ लगते क्षेत्र में ठीक ऐसा ही पुल बनाकर उसे जनता को सपुर्द किया जाए तो क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अधिक विकसित होगा।

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